Dharm & religion; Vigyan & Adhyatm; Astrology; Social research

Dharm & Religion- both are not the same; Vigyan & Adhyatm - Both are the same.....

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Er. D.K. Shrivastava Astrologer


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सतईसा (गंड-मूल नक्षत्र) क्या है ?

Posted On: 23 Apr, 2011  
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कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे

Posted On: 28 Mar, 2011  
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Others लोकल टिकेट में

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ज्योतिष : १. आवो ज्योतिष सीखे ; A-B-C to X-Y-Z of ASTROLOGY. राशी क्या हैं ?

Posted On: 27 Apr, 2010  
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योगशास्त्र एवं आध्यात्म – 2. पहले मुर्गी हुई या अंडा

Posted On: 19 Jun, 2010  
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डर लगता है |

Posted On: 3 Jan, 2012  
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दुल्हन रो रही है !

Posted On: 3 Jan, 2012  
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OBAMA THE GREAT, THE REAL HERO OF THE WORLD; WAKE UP INDIA

Posted On: 3 May, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सनातन धर्म के सोलह संस्कार

Posted On: 19 Apr, 2011  
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क्रिकेट को राष्ट्रिय खेल घोषित किया जाये |

Posted On: 4 Apr, 2011  
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बंधू रे भजन बिना क्या जीना

Posted On: 10 Mar, 2011  
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ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना

Posted On: 10 Mar, 2011  
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Optimistic & Pessimistic : एक चीझ का दो नजरिया

Posted On: 1 Mar, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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श्रीवास्तव जी नमस्ते | आप किस आधार पर क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल बनाने की वकालत कर रहे हैं ? हॉकी मे आपको कौन सी कमी नज़र आ गयी ? क्या आप जानते हैं कि भारत में क्रिकेट का प्रतिनिधित्व करने वाली 'बीसीसीआई' एक प्राइवेट संस्था है और क्रिकेट खेलने वाले सारे खिलाड़ी सिर्फ कहने को ही देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, असल में वो अपने और बीसीसीआई के लिए खेलते हैं | और अब आईपीएल आने के बाद तो इस खेल का कितना "बाजारीकरन" हो गया है इसका अंदाज़ा आप सहज ही लगा सकते हैं | ये तो आपको भी पता होगा कि असली क्रिकेट 'टेस्ट क्रिकेट' है | तो जो खिलाड़ी आईपीएल या दूसरे टी-20 मैच में सिर्फ अंधाधुंध शॉट लगा रहे हैं, वो टेस्ट क्रिकेट में कितना कामयाब हो पाएंगे ?? क्या इस महज़ तीन घंटे चलने वाले मैच के खिलाड़ी अपने आप को पाँच दिन चलने वाले टेस्ट मैच के लिए उपयुक्त साबित कर सकते हैं ?? मैं सभी खिलाड़ियों के बारे मे तो नहीं कह रहा लेकिन ज़्यादातर पर ये बात लागू हो सकती है | और दूसरी तरफ हॉकी कि बात करे तो क्या कोई खिलाड़ी बिना काबिलियत के एक भी गोल कर सकता है ?? इसलिए मैं आपकी इस सोच के साथ इत्तेफाक़ नहीं रखता हूँ कि क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया जाये ||

के द्वारा: sandeepkaushik sandeepkaushik

हाँ मित्र मुझे पता है की खेल साम्प्रदायिक नहीं है...साम्प्रदायिक तो इन्सान भी नहीं है...और ना ही पृथ्वी का कोई भी जीव है...सांप्रदायिक तो सोच है. जो उस दिमाग की उपज है जो अज्ञानी है, और पुरे विश्व में कई लोग ऐसे हैं जिनकी सोच ऐसी, मेरा यह प्रयास उस सोच पर ही एक कटाक्ष है, आजादी के बाद हमने अंग्रेजों के चलाये हर चलन को हर को बिना सोचे समझे अपना लिया, अपने दिमाग और सोचने की शक्ति प्रयोग बहुत कम किया, ज़रा सोचिये, आज मुंबई शहर का हर व्यक्ति लगभग ३ घंटे रोज़ सफ़र करने में बर्बाद करता है, शहर की बनावट आवागमन की दृष्टी से व्यापार के लिए कितनी उपयुक्त है.मगर आजादी से पूर्व समुद्र के रास्ते जो सामान लाया जाता था उसकी द्रष्टि से उपयुक्त था पर आज हमने उसे हर काम के लिए ही उपयुक्त मान लिया जिनके लिए वो नहीं है और न हो सकता तो क्या हमारे देश का वत्तीय राजधानी कोई ऐसा शहर नहीं होना चाहिए जो काम करने वाले व्यक्तियों की द्रष्टि से उपयुक्त हो. क्योकि हम इंसान हैं घुलाम नहीं, और अगर घुलामों की ज़िन्दगी देखनी है तो एकबार मुंबई अवश्य जाइए और वहाँ का जनजीवन देखिये,.. और ज़रा सोचिये, के हमारी ऐसी इतनी और कितनी ही समस्याएं है.....और हां एक सवाल संसद में अंग्रेजी बोलने का उद्देश्य क्या है??

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हाँ मेरे ख़याल से क्रिकेट को ही भारत का रास्ट्रीय खेल घोषित करना चाहिए क्योकि ये खेल हमारे उन महान पूर्वजों की दें हैं., जिन्होंने लगभग ३०० साल तक हमारी खटिया खड़ी और बिस्तर गोल किया है, उन्होंने हमपर बाप बनकर राज किया है, इसलिए आज अगर भारतीय मीडिया अपने इन पूर्वजों के लिए इतना समर्पित है तो इसमें बुराई क्या है, ये तो हमारा सोभाग्य है. तो क्या हुआ के ये खेल दुनिया में इतना ज्यादा प्रसिद्द नहीं है जितना hockey है. मगर क्रिकेट से ही प्यार करेंगे क्योकि आजादी के पहेले भी जब भारत में क्रिकेट का महान खेल खेला जाता था तो हम भारतीय बौन्द्री पर जमा होकर बस एक ही बात सोचते थे, की बस किसी तरह अगर इन महान लोगों के चरण चुने को मिल जाये तो बात बन जाये, और इसलिए जब वे हमे छोड़कर गए तो हमने हर स्टार पर उनके गुणगान गान गाना शुरू कर दिया, हमारे बड़े बड़े राजाओं ने इस खेल को खेला और नेता ने इसमें खड़े होकर तालिय बजायीं. तो बस मीडिया क्या करती, अंग्रेजों के बाद क्रिकेट को ही उनकी याद में अपना बाप बना लिया......pplease क्रिकेट को मेरे इस वतन का रास्ट्रीय खेल बना दो.

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के द्वारा: Er. D.K. Shrivastava Astrologer Er. D.K. Shrivastava Astrologer

परम आदरणीय अन्ना हजारे साहब को कोटि-२ बार प्रणाम,५ अप्रैल से आप सभी महानुभावो के द्वारा किये जा रहे अभूतपूर्व कार्य के लिए यह देश सदैव आप सभी जनों का कर्जदार रहेगा,हम आप सभी के द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन युद्ध में अपनी तहसील लहरपुर जनपद सीतापुर उत्तर प्रदेश में भी अपने युवा साथियों के साथ सामूहिक उपवास पर बैठेंगे ,तथा हम अपनी भावना को शब्दों में प्रकट नहीं कर सकते है ,बस इतना है क़ि आगे-२ आप रहेगे पीछे-२ सारा देश आप के साथ होगा,(केवल भ्रष्टो को छोड़कर ),और हम सभी लोगो ने इस सम्बन्ध में पत्रक भी बटवाए हैं, अब समय आ गया है क़ि भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस जन युद्ध में आप सभी जनों के मार्गदर्शन में हम लोग राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करे, भावना प्रेषक मुकुल सौरभ त्रिपाठी ग्राम पोस्ट गुरेपारा जिला सीतापुर (उत्तर प्रदेश )मो०-०९५०६९५६५७२ विशेष निवेदन-मान्यवर अगर कोई दिशा निर्देश हो तो हम हर सेवा के लिए तैयार है,तथा हम अपने आप को धन्य समझेगे ,

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के द्वारा: Er. D.K. Shrivastava Astrologer Er. D.K. Shrivastava Astrologer

आदरणीय महोदय नमस्ते , मेरी आपसे कल शाम फ़ोन से बात हुई थी आपने मुझे अपने बारे में पूरी डिटेल ब्लॉग पर डालने के लिए कहा था इसलिए मैं अपने बारे में डिटेल भेज रहा हूँ. NAME – सतीश चन्द्र शर्मा PRESENT ADDRESS – बहजोई ( मुरादाबाद ) उ . प्र . DATE OF BIRTH – 16 अप्रैल 1985 PLACE OF BIRTH – VILLAGE –बबराला , TEHSIL – गुन्नौर (BADAUN) U.P. TIME OF BIRTH – सायं ७ बजकर २८ मिनट NAKSHTRA – शतभिषा MARITATAL STATUS- MARRIED आप मुझे मेरे भविष्य के बारे में बताने का कष्ट करें कि मेरे लिए सरकारी नौकरी का योग है या बिजनेस का यदि बिजनेस का योग है तो क्या बिजनेस करूँ और यदि सरकारी नौकरी के लिए कोई उपाय हो तो बताएं वैसे मैं अपना फ्लोर मिल का मिनी प्लांट लगाने की सोच रहा हूँ क्या यह बिजनेस मेरे लिए ठीक रहेगा कि नहीं? यदि नहीं तो कौन सा बिजनेस मेरे लिए ठीक रहेगा यह बताने का कष्ट करें मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा सतीश चन्द्र शर्मा बहजोई (मुरादाबाद) उ. प्र. - २०२४१० मोबाइल नंबर - 09759885985

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बवाल काटने वाले शांति से कभी नहीं रह पायेगे | अगर वास्तव में शांति से रहना चाहते हो तो चिझो को व्यक्तिगत या धर्मगत न लो | कोई भी धर्म गाली देना, तलवार से काटना और हिंसा नहीं सिखाता है | अगर कोई व्यक्ति गाली गलौज और हिंसा करता है तो खुद अपनी और अपने धर्म की भी हानी करेगा | धर्म सिर्फ प्रेम सिखाता है | मैंने सिर्फ व्यक्ति विशेष पर लिखा है न की किसी मुस्लिम और हिन्दू पर | हर लेख में सन्दर्भ भी किताब का दिया हुआ है | अगर वास्तव में मेरी कोई बात गलत है तो उसे सार्थक रूप से किसी किताब का या किसी प्रमाण का सहारा ले कर काटो सिर्फ अपने व्यक्तिगत विस्वास के आधार पर गलत न काटो | अगर सत्य होगा तो मै भी स्वीकार करूँगा और दुनिया भी मानेगी |

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आपने बहुत ही अच्छे प्रशन किये है |बस अब भारत के लोगो को समझने की जरूरत है |सभी भारत वासी अगर देश के गदारो को पहचान जाये तो सब कुछ ठीक हो जाये | जागो भारतीयो जागने का वक्त् आ गया है, अत्तीत के गद्दारो को पहचानने का वक्त् आ गया है। उठो सोने वालों सबेरा हुआ है। वतन के फकीरो का फेरा हुआ है।। उठो अब निराशा निशा खो रही है सुनहली-सी पूरब दिशा हो रही है उषा की किरण जगमगी हो रही है विहंगों की ध्वनि नींद तम धो रही है तुम्हें किसलिए मोह घेरा हुआ है उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।। उठो बूढ़ों बच्चों वतन दान माँगो जवानों नई ज़िंदगी ज्ञान माँगो पड़े किसलिए देश उत्थान माँगो शहीदों से भारत का अभिमान माँगो घरों में दिलों में उजाला हुआ है। उठो सोने वालों सबेरा हुआ है। उठो देवियों वक्त खोने न दो तुम जगे तो उन्हें फिर से सोने न दो तुम कोई फूट के बीज बोने न दो तुम कहीं देश अपमान होने न दो तुम घडी शुभ महूरत का फेरा हुआ है। उठो सोने वालों सबेरा हुआ है। हवा क्रांति की आ रही ले उजाली बदल जाने वाली है शासन प्रणाली जगो देख लो मस्त फूलों की डाली सितारे भगे आ रहा अंशुमाली दरख़्तों पे चिड़ियों का फेरा हुआ है। उठो सोने वालों सबेरा हुआ

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निश्चित ही ईश्वर के रास्तें में चमत्कारी शक्तिया अवरोध का काम करती हैं | हर चक्र या शरीर (पञ्च शरीर) के भेदन पर व्यक्ति को नई नई शक्तियों का अनुभव होता है | उन शक्तियों को चमत्कार समझ व्यक्ति उसी में उलझ कर रह जाता है तथा संसार में उन शक्तियों का प्रदर्शन करने लगता है | सिद्धियाँ चक्र भेदन करने पर प्राप्त हुई वो शक्तियां है जो सामान्य व्यक्तियों के लिए एक चमत्कार होती है | जैसे एक आदमी घर में नीचे खड़ा है तो सिर्फ वो अपनी गली में आ रहे व्यक्ति को ही देख सकता है | अगर उसे छत पर चढ़ने का सामर्थ्य आ जाये तो वह दूर रोड पर आ रहे व्यक्ति को भी देख सकता है जो नीचे से नहीं दिखाई दे सकता था | अगर वह व्यक्ति नीचे आ कर लोगो से कहता है कि देखो अमुक आदमी ५ मिनट में यहाँ आ जायेगा तो बाकि लोग आश्चर्य करेगे क्योंकि उन्हें छत पर चढ़ना नहीं आता है | वो सोचेंगे ये तो चमत्कार है | ये तो सिद्ध पुरुष है | ये तो पहले से ही बता दे रहा है | जबकि छत पे चढ़ पाने वाले के लिए ये सिर्फ साधारण बात है कि वो दूर तक देख सकता है | तो सिद्धिया यही है ; ज्यो ज्यो व्यक्ति ऊपर चढ़ता जाता है त्यों त्यों उसे देखने और कुछ करने की शक्तिया प्राप्त होती जाती है | अगर वह वही रुक जाता है उन्हें चमत्कार मानकर तो उसकी यात्रा रुक जाती है अन्यथा वह परमानन्द की और अग्रसर होता जाता है | दुनिया में जितने भी चिझे हो रही है या है वे सब ईश्वारिये ताकत ही है | एक धुल का कण भी ईश्वरिये ताकत का नमूना है | मानो तो धुल और अगर जानो तो वह कितने परमाणुओ की ताकत को अपने में समेटे हुए है | एक एक कण में कई कई ब्रह्माण्ड हैं | इसे गहराई से समझना होगा |

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मिश्र जी, सुख अपेक्षाओ की पूर्ति है | जब अपेक्षाए पूरी नहीं होती तो अस्वीकार की भावना का जन्म होता है जो दुःख का कारण होता है | न सुख हमेशा के लिए होता है न दुःख ; जब हम किसी भी चीझ को मन से स्वीकार लेते है तो सुख होता है और अगर अस्वीकार करते है तो दुःख होता है | तो हमारा मन ही सुख और दुःख का कारण है जो स्वीकार या अस्वीकार करता है | कोई भी चीझ हमेशा के लिया स्वीकार या अस्वीकार नहीं होती | यह परिस्थिति जन्य एवं सापेक्षिक होती है | सामने का सन्दर्भ बदल जाये तो सुख या दुःख भी बदल जाता है | जैसे बेटे का जन्म हुआ तो बेटे का होना सुख, बेटा नालायक हुआ तो बेटे का होना दुःख | बेटे का जन्म हुआ तो सुख, बेटा अपंग पैदा हुआ तो दुःख | बेरोजगार के लिए नौकरी का मिलना सुख तथा IAS के योग्य बेरोजगार के लिए चपरासी का नौकरी मिलना दुःख; तो सुख एवं दुःख सापेक्षिक है; सन्दर्भ बदलते ही एक दुसरे में बदल जाता है | चाहे सन्दर्भ सांसारिक हो या मनोमय शरीर का भेदन करने वाले योगी का | दोस्त, जल्द ही मै इसका सटीक उत्तर अपने अगले आने वाले लेखन में दूंगा | पढ़ते रहे | धन्यबाद |

के द्वारा: Er. D.K. Shrivastava Astrologer Er. D.K. Shrivastava Astrologer

मिश्र जी, सुख अपेक्षाओ की पूर्ति है | जब अपेक्षाए पूरी नहीं होती तो अस्वीकार की भावना का जन्म होता है जो दुःख का कारण होता है | न सुख हमेशा के लिए होता है न दुःख ; जब हम किसी भी चीझ को मन से स्वीकार लेते है तो सुख होता है और अगर अस्वीकार करते है तो दुःख होता है | तो हमारा मन ही सुख और दुःख का कारण है जो स्वीकार या अस्वीकार करता है | कोई भी चीझ हमेशा के लिया स्वीकार या अस्वीकार नहीं होती | यह परिस्थिति जन्य एवं सापेक्षिक होती है | सामने का सन्दर्भ बदल जाये तो सुख या दुःख भी बदल जाता है | जैसे बेटे का जन्म हुआ तो बेटे का होना सुख, बेटा नालायक हुआ तो बेटे का होना दुःख | बेटे का जन्म हुआ तो सुख, बेटा अपंग पैदा हुआ तो दुःख | बेरोजगार के लिए नौकरी का मिलना सुख तथा IAS के योग्य बेरोजगार के लिए चपरासी का नौकरी मिलना दुःख; तो सुख एवं दुःख सापेक्षिक है; सन्दर्भ बदलते ही एक दुसरे में बदल जाता है | चाहे सन्दर्भ सांसारिक हो या मनोमय शरीर का भेदन करने वाले योगी का | दोस्त, जल्द ही मई इसका एक सटीक उत्तर अपने अगले आने वाले लेखन में दूंगा | पढ़ाते रहे | धन्यबाद |

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आपने सत्य कहा हे बिना करता के जिस प्रकार कोई किर्या नहीं होती इसी प्रकार ये अनंत जगत स्वयं नहीं बन सकता ऐसा सोचना तो वोही बात होगी की आटे में स्वयं पानी मिल गया और स्वयं रोटी सिक गयी और बिना हाथ के तोड़े मुह में चली गयी जसे ये संभव नहीं वेसे ही इस ब्रह्माण्ड का रचनाकार वोही हे जिसे वेद कहते हे सर्वसक्ति या परमपिता परमात्मा जिसका निज नाम ॐ हे अ उ म त्रि सकती रचन ,धारण ,प्रलय , सब कुछ उसी में समाहित हे जब प्रकर्ती सुसुप्त अवस्था में होती हे तब रचन काल पर वोही महासक्ती इस प्रकर्ती को जो सूक्ष्म अनु रूप में होती हे पुन जगदाकार रूप में लाता हे ताकि पूर्व स्रास्ती के जो जीवात्माए हे वो अपने कर्मो का भोग प़ासके और उनमे जो दोष हे उने दूर कर उन्नति कर एक दिन उस जगत्पिता के सनिन्द्य रूपी अनंत सुख को प़ा सके अर्तार्थ मोक्षा पाए जो मानव जीवन का परम उदेश्य हे और सब कुछ तो इस जीवन रूपी यात्रा के लिए उस पिता ने खेल खिलोने दिए हे ताकी जीवन के लम्बे सफ़र का यात्री इससे बोर न हो / अब कोई इन खेल खिलोनो को ही जीवन का उद्देश्य मान ले तो ये उसकी भूल नही तो क्या हे

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आपने जो मूर्ति पूजा की नोट पे मोहर से तुलना की हे वो उचित नहीं हे क्योकि दोनों अलग अलग पदार्थ हे एक चेतन एक जड़/ परमात्मा चेतन हे---दोस्त, परमात्मा की दुनिया में कोई भी पदार्थ जड़ नहीं है, सभी चैतन्य है; भले ही वे हमारे चेतना की परिभाषा में न आते हो | अगर कोई चित्रकार आपका चित्र बनाये वो भी आपकी सुरत से अलग अपनी कल्पना से बिलकुल बिना आपको देखे तो क्या आप या आपके घरवाले उसे आपका चित्र मान लेगे----दोस्त, मेरे और परमात्मा के चित्र में अंतर है | मुझे चित्रकार देख सकता है, अपनी बनाई हुई मेरी चित्र से मेरा मिलान कर सकता है और लोग भी मिलान कर सकते है क्योकि मै और मेरा चित्र दोनों प्रत्यक्ष हैं | किन्तु मूर्ति से परमात्मा का मिलन कौन कर सकता है, किसकी सामर्थ्य है उतनी | परमात्मा कल्पनातित है, तभी तो उसे अलग अलग कल्पनाओ में ढालते है| लेकिन भावना एक ही रहता है कि यह परमात्मा है | सच्चाई छूप नही सकती झूटे उसूलो से और खुसबू आ नही सकती कागज के फूलो से ....दोस्त, भावना का खेल बहुत महान है | भावना भी पूर्णतः वैज्ञानिक है | भावनाओ कि भी उर्जा होती है जो कि शरीर से निकलती है और बहुत कुछ करने में समर्थ है | ये सत्य है कि कागज के फुल से खुश्बू नहीं आती किन्तु अगर किसी कि भावना अत्यंत प्रबल हो तो कागज के फुल से भी वो अपनी भावना के अनुरूप महक ले सकता है, भले ही दुसरो को वो महक न आये या कागज के फुल का महक न हो किन्तु भावनाओ से निर्मित फुल का महक होगा वह | स्वर्ग और नरक कि कल्पना इसी भावना पर आधारित है | ये बड़ी गहरी बातें है, इसे समझना होगा |

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रेखा की परिभाषा बताते हो – इसकी चौड़ाई, मोटाई नहीं होती — और सर्वथा स्पष्ट मोटी रेखा खींच के कहते हो इसे बिना चौड़ाई की मानो | यह कैसा पागलपन है ! खुर्दबीन से देखोगे तो वह आधी इंच चौड़ी दिखाई देगी | जैसे तुम अपनी भूमिति में मानते हो, वैसे ही भक्तिशास्त्र कहता है कि इस शालग्राम में परमेश्वर मानो | अगर रेखा को परिभाषा के बिपरीत होने के कारण मानने से इंकार कर दोगे तो रेखागणित का अस्तित्व ही ख़त्म हो जायेगा | फिर रेखागणित रहेगा ही नहीं | इससे जुड़े हुए वे सारे विकाश पीछे हो जायेगे | इसी तरह से अगर पत्थर में भगवान् मानने से इंकार कर दोगे तो फिर भगवान की बात ही ख़त्म हो जाएगी, क्योकि उस विराट को उसके असली स्वरुप में समझने वाले विरले ही होगें| अतः विराट को जानने के लिए हम जैसे साधारण जीवों को स्थूल मूर्ति का सहारा लेना ही होगा | कहते हो…मूर्ति पूजा बेकार है, क्या पत्थरों में भी भगवान है ? मै कहता हूँ… एक बच्चे को पहले ‘क’ सिखाया जाता है बड़ा लिखकर, फिर धीरे धीरे छोटा किया जाता है | पहले सरल अक्षर, फिर संयुक्ताक्षर सिखाया जाता है | पहले ‘क’ सीखोगे तब ‘कमल’ जानोगे | पहले मूर्ती में भगवान समझो, तब ही उसका व्यापक रूप समझ आएगा |

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डीके श्रीवास्तव जी आपका लेख देखा आपने जो मूर्ति पूजा की नोट पे मोहर से तुलना की हे वो उचित नहीं हे क्योकि दोनों अलग अलग पदार्थ हे एक चेतन एक जड़/ परमात्मा चेतन हे और नोट जड़ भला कल्पना से किसी वास्तु का मूल भाव बदल सकता हे आप कहते हे की मूर्ति में इस्वर की कल्पना हे इसलिए उसमे इस्वर होगा आश्चर्य हे / हम आपसे एक बात पूछते हे अगर कोई चित्रकार आपका चित्र बनाये वो भी आपकी सुरत से अलग अपनी कल्पना से बिलकुल बिना आपको देखे तो क्या आप या आपके घरवाले उसे आपका चित्र मान लेगे नहीं न इसी तरह परमात्मा को उसी रूप में मानो जेसा उसने खुद का स्वरुप बताया हे आदि सृस्ती में ही उसने वेदों के द्वारा अपने स्वरूप का सच्चा ज्ञान तथा इस सृस्ती का ज्ञान भी आदि रिसियो को दे दिया था क्या ऐसा हो सकता हे कोई वैज्ञानिक कोई अविष्कार तो करे पर उसके प्रयोग का ज्ञान न दे जब इक छोटा सा वज्ञानिक ऐसा नहीं करता तो जो सारे ब्रहमांड का अतुलनीय अविष्कारक हे इसको बनाने वाला हे वो इसका ज्ञान नहीं देगा इसलिए इस अनंत ब्रह्माण्ड के ज्ञान के साथ ही उसने अपने स्वरूप का ज्ञान भी वेदों में दे दिया हे देखए याजर्वेद कहता हे की ४० अ ० में न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम मह्द्यायाषा ' अर्तार्थ उस पर्मेस्वेर की कोई प्रतिमा नहीं हे वो केवेल अपने नाम से विख्यात हे यश से अर्तार्थ अपने कर्मो से क्योकि उसका कोई प्रतिमान नहीं हे तोलने वाला नहीं हे इसलिए उसकी कोई प्रतिमा नहीं बन सकती क्योकि सारा संसार उसी में इस्तिथ हे इस संसार में इतना पदार्थ कहा हे जो उसे अपने में धारण कर सके या उसकी तुलना की मूर्ति बना सके / मित्र इसलिए इस झूटे सोच से बाहर निकलिए की भावना से मूर्ति BHAGVAN बन जायगी क्योकि मूर्ति जड़ की जड़ रहगी चेतन परमात्मा जेसे गुण उसमे कभी नहीं आ सकते वो तो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकती भला भक्तो का क्या भला करेगी भला भावना कोई सच्चाई बदल सकती हे नहीं आप कित्न्नी ही भावना करे की मिटटी बूरा हे पर मिटटी बूरा का काम नहीं करेगी चाहे आप सरे जिन्दगी मिटटी को बूरा की भावना देते रहे भावना केवल तभी चरितार्थ होती हे जब भावना सत्य आश्रित हो यानि जो जेसा हे वेसा ही माना जाये परमात्मा का स्वरुप जेसा हे वेसा ही मानने से वो हमारा होगा जब भला हम उसे मान ही नहीं रहे और मूर्ति को पूज रहे हे तो क्या वो पागल हे जो बीच में कूद पड़ेगा कोई डीके श्रीवास्तव जी से बात न करके उनकी किसी कालपनिक मूर्ति से बात करने लगे तो क्या वो बेमतलब बीच में कूद पड़ेंगे नहीं बल्कि वो तो ये कहंगे के कितना पागल हे की मुझसे तो बात करता नहीं और मूर्ति से बात कर रहा हे / क्या आप परमात्मा को ये मानते हे की वो इंसान के बराबर भी ये नहीं जानता/ एक और उद्धरण से समझाता हूँ आप अगर अग्नि में सीतलता की भावना करके उसमे हाथ दे तो क्या आपके हाथ नहीं जलेंगे अवस्य जलेंगे मित्र जेसे आपकी झूटी भावना से अग्नि अपना स्वभाव नहीं छोडती वेसी ही पत्थर अपना स्वाभाव जड़ता छोड़ कभी भी परमात्मा के गुणों वाला नही हो सकता उसे जानना हे तो "हेर्दय ह्राद्रिस्थं मनसा एनं "अर्तार्थ उसका निवास हेर्दय में हे और उसे केवल मन से जाना जा सकता हे जब तक अन्तर चक्षु नही खुलते तब तक उसके दरसन नही होते एक सायर के सब्दो से अपनी बात समाप्त कर रहा हु "सच्चाई छूप नही सकती झूटे उसूलो से और खुसबू आ नही सकती कागज के फूलो से " जेसे आप कितनी ही भावना करे परन्तु कागज़ के फूलो से खुसबू नही आएगी इसलिय मित्र परमात्मा के स्वरूप को वेसा ही मनो जेसा उसने स्वयं निर्देश दिया हे 'पावन वेद बताते हे परमात्मा का सच्चा स्वरूप" विशेष रूप से इसी विषय पर लिखा गया लेख देखिएगा "बिना वेद नहीं मिला भेद उस जगदाधार खिलाडी को इधेर उधर घूमकर बन्दे खोये क्यों उम्र सारी को "  समझिये

के द्वारा: aakash1992 aakash1992

डीके श्रीवास्तव जी आपका लेख देखा आपने जो मूर्ति पूजा की नोट पे मोहर से तुलना की हे वो उचित नहीं हे क्योकि दोनों अलग अलग पदार्थ हे एक चेतन एक जड़/ परमात्मा चेतन हे और नोट जड़ भला कल्पना से किसी वास्तु का मूल भाव बदल सकता हे आप कहते हे की मूर्ति में इस्वर की कल्पना हे इसलिए उसमे इस्वर होगा आश्चर्य हे / हम आपसे एक बात पूछते हे अगर कोई चित्रकार आपका चित्र बनाये वो भी आपकी सुरत से अलग अपनी कल्पना से बिलकुल बिना आपको देखे तो क्या आप या आपके घरवाले उसे आपका चित्र मान लेगे नहीं न इसी तरह परमात्मा को उसी रूप में मानो जेसा उसने खुद का स्वरुप बताया हे आदि सृस्ती में ही उसने वेदों के द्वारा अपने स्वरूप का सच्चा ज्ञान तथा इस सृस्ती का ज्ञान भी आदि रिसियो को दे दिया था क्या ऐसा हो सकता हे कोई वैज्ञानिक कोई अविष्कार तो करे पर उसके प्रयोग का ज्ञान न दे जब इक छोटा सा वज्ञानिक ऐसा नहीं करता तो जो सारे ब्रहमांड का अतुलनीय अविष्कारक हे इसको बनाने वाला हे वो इसका ज्ञान नहीं देगा इसलिए इस अनंत ब्रह्माण्ड के ज्ञान के साथ ही उसने अपने स्वरूप का ज्ञान भी वेदों में दे दिया हे देखए याजर्वेद कहता हे की ४० अ ० में न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम मह्द्यायाषा ' अर्तार्थ उस पर्मेस्वेर की कोई प्रतिमा नहीं हे वो केवेल अपने नाम से विख्यात हे यश से अर्तार्थ अपने कर्मो से क्योकि उसका कोई प्रतिमान नहीं हे तोलने वाला नहीं हे इसलिए उसकी कोई प्रतिमा नहीं बन सकती क्योकि सारा संसार उसी में इस्तिथ हे इस संसार में इतना पदार्थ कहा हे जो उसे अपने में धारण कर सके या उसकी तुलना की मूर्ति बना सके / मित्र इसलिए इस झूटे सोच से बाहर निकलिए की भावना से मूर्ति BHAGVAN बन जायगी क्योकि मूर्ति जड़ की जड़ रहगी चेतन परमात्मा जेसे गुण उसमे कभी नहीं आ सकते वो तो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकती भला भक्तो का क्या भला करेगी भला भावना कोई सच्चाई बदल सकती हे नहीं आप कित्न्नी ही भावना करे की मिटटी बूरा हे पर मिटटी बूरा का काम नहीं करेगी चाहे आप सरे जिन्दगी मिटटी को बूरा की भावना देते रहे भावना केवल तभी चरितार्थ होती हे जब भावना सत्य आश्रित हो यानि जो जेसा हे वेसा ही माना जाये परमात्मा का स्वरुप जेसा हे वेसा ही मानने से वो हमारा होगा जब भला हम उसे मान ही नहीं रहे और मूर्ति को पूज रहे हे तो क्या वो पागल हे जो बीच में कूद पड़ेगा कोई डीके श्रीवास्तव जी से बात न करके उनकी किसी कालपनिक मूर्ति से बात करने लगे तो क्या वो बेमतलब बीच में कूद पड़ेंगे नहीं बल्कि वो तो ये कहंगे के कितना पागल हे की मुझसे तो बात करता नहीं और मूर्ति से बात कर रहा हे / क्या आप परमात्मा को ये मानते हे की वो इंसान के बराबर भी ये नहीं जानता/ एक और उद्धरण से समझाता हूँ आप अगर अग्नि में सीतलता की भावना करके उसमे हाथ दे तो क्या आपके हाथ नहीं जलेंगे अवस्य जलेंगे मित्र जेसे आपकी झूटी भावना से अग्नि अपना स्वभाव नहीं छोडती वेसी ही पत्थर अपना स्वाभाव जड़ता छोड़ कभी भी परमात्मा के गुणों वाला नही हो सकता उसे जानना हे तो "हेर्दय ह्राद्रिस्थं मनसा एनं "अर्तार्थ उसका निवास हेर्दय में हे और उसे केवल मन से जाना जा सकता हे जब तक अन्तर चक्षु नही खुलते तब तक उसके दरसन नही होते एक सायर के सब्दो से अपनी बात समाप्त कर रहा हु "सच्चाई छूप नही सकती झूटे उसूलो से और खुसबू आ नही सकती कागज के फूलो से " जेसे आप कितनी ही भावना करे परन्तु कागज़ के फूलो से खुसबू नही आएगी इसलिय मित्र परमात्मा के स्वरूप को वेसा ही मनो जेसा उसने स्वयं निर्देश दिया हे 'पावन वेद बताते हे परमात्मा का सच्चा स्वरूप" विशेष रूप से इसी विषय पर लिखा गया लेख देखिएगा "बिना वेद नहीं मिला भेद उस जगदाधार खिलाडी को इधेर उधर घूमकर बन्दे खोये क्यों उम्र सारी को " इस परम सत्य को पहचानिए

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डीके श्रीवास्तव जी आपका लेख देखा आपने जो मूर्ति पूजा की नोट पे मोहर से तुलना की हे वो उचित नहीं हे क्योकि दोनों अलग अलग पदार्थ हे एक चेतन एक जड़/ परमात्मा चेतन हे और नोट जड़ भला कल्पना से किसी वास्तु का मूल भाव बदल सकता हे आप कहते हे की मूर्ति में इस्वर की कल्पना हे इसलिए उसमे इस्वर होगा आश्चर्य हे / हम आपसे एक बात पूछते हे अगर कोई चित्रकार आपका चित्र बनाये वो भी आपकी सुरत से अलग अपनी कल्पना से बिलकुल बिना आपको देखे तो क्या आप या आपके घरवाले उसे आपका चित्र मान लेगे नहीं न इसी तरह परमात्मा को उसी रूप में मानो जेसा उसने खुद का स्वरुप बताया हे आदि सृस्ती में ही उसने वेदों के द्वारा अपने स्वरूप का सच्चा ज्ञान तथा इस सृस्ती का ज्ञान भी आदि रिसियो को दे दिया था क्या ऐसा हो सकता हे कोई वैज्ञानिक कोई अविष्कार तो करे पर उसके प्रयोग का ज्ञान न ��%A

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बीरबल ने अकबर से कहा आप जिस सर धड से अलग करा रहें हैं वोह का बेटा है हजूर ,अकबर ने बीरबल की बात समझ गए और बात अयिगायी हो गई अभी हमरे देश में भोइपल कांड को जब अदलत ने इतना छोटा सा जुर्म समझ हए उस पैर अपने आदेश हुए पूरा देश हिल गया पैर अदलत क्या करे जैसे केस की पर्व्वी करी गई अदलत उसी हिसाब से सजा सुनेगी कानून हमरे देश में सुब की नाघों में भगवन के दुसरे रूप में है जब इस की हक़ुईक़त का पता चला तब कोई नहीं बोल परः एक दुसरे परकीचड़ उचल रहे हैं जब भी कांग्रेस थी आज भी congree स है कैसे अपने पुराने हमसाथी को सजा डे यहाँ साथी ही akabhi hian chaley गए yadoon में सर pit lo kuch honey wala नहीं kyun की whan बेटा tha यहाँ raja के saamney nayay karney abh 40 saal lagjayengeyyeh सजा इस budpey में कैसे hum saath kheleynegey

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के द्वारा: Er. D.K. Shrivastava Astrologer Er. D.K. Shrivastava Astrologer

के द्वारा: Er. D.K. Shrivastava Astrologer Er. D.K. Shrivastava Astrologer

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के द्वारा: rajkamal rajkamal

हाँ दोस्त आपने जो कहा वह एकदम सत्य है पर आज के जमाने मे यह कोई कहने का साहस नहीं कर सकता की कोई मुस्लिम शासक महान नहीं था और जंहा तक मै समझ सकता हूँ की हमारे राजनेता तो बिलकुल ही नहीं कह सकते की मुस्लिम शासक महान नहीं थे पर हमको अंग्रजो से भी ज्यादा दुःख मुस्लिम सासको नै दिया और बहुत अन्याय किया जबकि अंग्रजो ने अन्याय भी बहुत किया मगर बहुत कुछ जनता को भी दिया जो उनके चमचे थे मगर मुगलों ने तो चमचों को भी नहीं छोड़ा जिनकी बीबियाँ खुबसूरत थी और हिन्दवो को मुस्लिम बनाया मंदिर की जगहों पर मख्बरा बनाया या मस्जिद बनवा दी उसको कोन शख्स महान कहता है और जो महान कहता है वो बुदजिल या कायर ही हो सकता है यह सब इतिहास मै है .

के द्वारा: drsinwer drsinwer

अरे यार हद हो गई एक बात तो बताओ अकबर से दुश्मनी क्या है आपकी ...वह तो मर चुके है न, चैन से मरा रहने दो उन्हें ...या कोई जातिय दुश्मनी है क्या भई....हर ब्ळॉग में अकबर की बुराई यार उनके बार में लिखते जो जिंदा है तो अच्छा भी लगता .. कभी कसाब या अफजल या किसी नेता की ऐसी खिचाई की है आपने ....... ठीक है माना कि अकबर गलत था तो ...यार ताजमहल तो देकर गया न .. और रही बात हरम की तो आपने इतिहास की गलत किताब पढी है हरम में सेविकाएं और हिजड्डे रहते थे जिन्हें अ[पनी मर्जी से आने जाने की इजाजत होती थी. ..... एक भारतीय हो ने के नाते आप  भारतीय इतिहास की धज्जियां क्यूं उडा रजहै है क्या मिलेगा इससब से ..क्या अकबर को सजा होगी? ठीक है आप अपने भावनाओं की अभिव्यक्ति करना चाहते है परंतु गलत तथ्यों के सहारे ऐसी बातें करना गलत है ...आपकी लेखनी में दम है उसका सही प्रयोग करें. धीरज जी, अकबर महान था या नही लेकिन बचपन से ही उसकी कुछ बातें बच्चों को सही राह भी दिखाती है जैसे सबसे प्रेम करना, अतिथियों का सत्कार करना आदि. क्या ऐसे चरित्रों के बारें में ऐसा कहना सही है. इतिहास के कई चरित्र है जिनके बारें में कहा जाता है कि उनका चरित्र खराब था लेकिन फिर भी हमें उससे काफी सिखने को मिलता हैं

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के द्वारा: Astrologer DHIRAJ KUMAR Astrologer DHIRAJ KUMAR

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धीरज जी,अच्छा लगा आपका भाव,कई बार मैं भी यही सोचता हूँ,फिर इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि मैं परमात्मा का अंश हूँ उनका पुत्र हूँ जो मेरी आत्मा है,मुझे मेरे प्रारब्ध के अनुसार प्रभु ने मुझे यह शरीर देकर पृथ्वी पर भेजा है,मानव योनी दी इसका अर्थ है प्रभु मुझसे कुछा बेहतर करवाना चाहते हैं तो भैया मालिक को जो कराना है वो करवा लेगा,उसके लिए व्यवस्था भी वोही बनाएगा,बस मेरी तो ये प्रार्थना है मेरे पिता से कि मुझसे वो करवाओ जिसका जब मैं अंतिम सासें ले रहा होऊं नब्ज डूब रही हो तो अपने किये को याद करके सुकून मिले,होठों पे मुस्कराहट हो और आपसे मिलने पर आपको बता सकूं कि हे पिता मैंने जो भी किया वो मेरे माध्यम से आपने ही किया,

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