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योगशास्त्र एवं आध्यात्म – २८. सुख और दुःख : प्रेम विवाह जितना दुःख लाता है उतना आयोजित विवाह नहीं ला सकता

Posted On: 28 Jul, 2010 Others में

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इस सम्बन्ध में हम आपको एक उदाहरण देते है, अगर किसी का विवाह माता पिता ने कर दिया तो बहुत सुख कि अपेक्षा नहीं हो सकती इसलिए दुःख भी अधिक फलित नहीं होता | प्रेम विवाह जितना दुःख लाता है उतना आयोजित विवाह नहीं ला सकता | पश्चिम के लोगो ने सोचा – प्रेम विवाह बहुत सुख देगा | उन्होंने एक प्रकार से ठीक ही सोचा था | लेकिन उन्हें दूसरी बात का पता नहीं था कि प्रेम विवाह बहुत बड़ा दुःख भी उत्पन्न करेगा, क्योंकि जितने बड़े सुख की अपेक्षा होगी तो जब उसका रुपान्तरण होगा तो उतना ही बड़ा दुःख उत्पन्न होगा | अनुपात हमेशा बराबर ही रहेगा |

हमारे देश के लोग होशियार थे एक दृष्टि में | उन्होंने एक दूसरा ही प्रयास किया | प्रयास यह किया कि सुख की अपेक्षा ही कम करे | आयोजित विवाह न अधिक सुख दे सकता है न अधिक दुःख | इसलिए यह चल सकता है और चल गया | प्रेम विवाह चल नहीं सकता, क्योंकि इतने बड़े सुख की आशा तो उतना ही दुःख मिलेगा, जब टूटेगा | जितना अधिक ऊंचाई जाइएगा उतना ही अधिक गहराई बढ़ेगी | समझे न, चाहा था शिखर और उपलब्ध होती है खाई |

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
July 28, 2010

बिलकुल सही लिखा है आपने वास्तव में प्रेम विवाह, सामान्य विवाह के मुकाबले सफल नहीं होते हैं क्योंकि जो प्यार उनमे शादी से पहले था वो शादी के बाद नहीं रह जाता और यही कारण है कि प्रेम विवाह सफल नहीं होते जब उनमे आपस में प्रेम कम होता है और शक बढ़ता जाता और यही कारण है कि प्रेम विवाह सफल नहीं होते नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद) उ.प्र. मोबाइल नम्बर – 09719390576

    Er. D.K. Shrivastava Astrologer के द्वारा
    July 29, 2010

    ठीक कहा आपने नवीन जी, वास्तव में प्रेम विवाह में अपेक्षाए होती है एवं आयोजित विवाह में समर्पण; इसी अपेक्षाओ के कारण प्रेम विवाह बिफल हो जाते है क्योंकि अपेक्षाओ की पूर्ति नहीं होती |


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