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क्रिकेट को राष्ट्रिय खेल घोषित किया जाये |

Posted On: 4 Apr, 2011 Others,sports mail में

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दोस्तों, आज क्रिकेट भारत के रग रग में बसता है | मैच के दौरान गलिया, चौराहे, ऑफिस सारे के सारे खाली हो जाते है, सडको पर सन्नाटा छा जाता है | सिर्फ एक ही सवाल होता है — कितना स्कोर हुवा ?

मेरी भारत सरकार से मांग है कि क्रिकेट को राष्ट्रिय खेल घोषित किया जाये और अगर नहीं तो बताया जाये कि रास्ट्रीय खेल होने के लिए क्या अहर्ताए होती है ?

धीरज कुमार श्रीवास्तव, पटना, बिहार ०४-०४-२०११. ९४३१०००४८६,

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sandeepkaushik के द्वारा
April 21, 2011

श्रीवास्तव जी नमस्ते | आप किस आधार पर क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल बनाने की वकालत कर रहे हैं ? हॉकी मे आपको कौन सी कमी नज़र आ गयी ? क्या आप जानते हैं कि भारत में क्रिकेट का प्रतिनिधित्व करने वाली ‘बीसीसीआई’ एक प्राइवेट संस्था है और क्रिकेट खेलने वाले सारे खिलाड़ी सिर्फ कहने को ही देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, असल में वो अपने और बीसीसीआई के लिए खेलते हैं | और अब आईपीएल आने के बाद तो इस खेल का कितना “बाजारीकरन” हो गया है इसका अंदाज़ा आप सहज ही लगा सकते हैं | ये तो आपको भी पता होगा कि असली क्रिकेट ‘टेस्ट क्रिकेट’ है | तो जो खिलाड़ी आईपीएल या दूसरे टी-20 मैच में सिर्फ अंधाधुंध शॉट लगा रहे हैं, वो टेस्ट क्रिकेट में कितना कामयाब हो पाएंगे ?? क्या इस महज़ तीन घंटे चलने वाले मैच के खिलाड़ी अपने आप को पाँच दिन चलने वाले टेस्ट मैच के लिए उपयुक्त साबित कर सकते हैं ?? मैं सभी खिलाड़ियों के बारे मे तो नहीं कह रहा लेकिन ज़्यादातर पर ये बात लागू हो सकती है | और दूसरी तरफ हॉकी कि बात करे तो क्या कोई खिलाड़ी बिना काबिलियत के एक भी गोल कर सकता है ?? इसलिए मैं आपकी इस सोच के साथ इत्तेफाक़ नहीं रखता हूँ कि क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया जाये ||

    DKS के द्वारा
    April 23, 2011

    सिर्फ इस आधार पर की आज क्रिकेट जन जन के मन में बसता है | आप एक निष्पक्ष भोटिंग करा ले, आपको जबाब मिल जायेगा | हालाँकि मै आपके बातो से सहमत हूँ क्रिकेट के बारे में | लेकिन समय के साथ सबकुछ बदलता है |

    संदीप कौशिक के द्वारा
    May 1, 2011

    मैं खुद भी क्रिकेट देखने का शौकीन हूँ साहब, लेकिन इसे राष्ट्रीय खेल बनाने के पक्ष में कतई नहीं हूँ | आईपीएल आने के बाद तो इसके स्तर में बहुत गिरावट आई है | हर कोई देश के लिए न खेलकर सिर्फ पैसे के लिए खेल रहा है |

Ravi goswami के द्वारा
April 17, 2011

हाँ मेरे ख़याल से क्रिकेट को ही भारत का रास्ट्रीय खेल घोषित करना चाहिए क्योकि ये खेल हमारे उन महान पूर्वजों की दें हैं., जिन्होंने लगभग ३०० साल तक हमारी खटिया खड़ी और बिस्तर गोल किया है, उन्होंने हमपर बाप बनकर राज किया है, इसलिए आज अगर भारतीय मीडिया अपने इन पूर्वजों के लिए इतना समर्पित है तो इसमें बुराई क्या है, ये तो हमारा सोभाग्य है. तो क्या हुआ के ये खेल दुनिया में इतना ज्यादा प्रसिद्द नहीं है जितना hockey है. मगर क्रिकेट से ही प्यार करेंगे क्योकि आजादी के पहेले भी जब भारत में क्रिकेट का महान खेल खेला जाता था तो हम भारतीय बौन्द्री पर जमा होकर बस एक ही बात सोचते थे, की बस किसी तरह अगर इन महान लोगों के चरण चुने को मिल जाये तो बात बन जाये, और इसलिए जब वे हमे छोड़कर गए तो हमने हर स्टार पर उनके गुणगान गान गाना शुरू कर दिया, हमारे बड़े बड़े राजाओं ने इस खेल को खेला और नेता ने इसमें खड़े होकर तालिय बजायीं. तो बस मीडिया क्या करती, अंग्रेजों के बाद क्रिकेट को ही उनकी याद में अपना बाप बना लिया……pplease क्रिकेट को मेरे इस वतन का रास्ट्रीय खेल बना दो.

    के द्वारा
    April 18, 2011

    दोस्त, कोई भी खेल न तो साम्प्रदायिक है न ही छेत्रिय न ही किसी देश का | खेल सिर्फ खेल है | जिसका मन जिस खेल में रुचे वो उसके लिए अच्छा है | खेल को कृपया किसी देश से न जोड़ो | अगर कोई भी खेल जन जन के नस में बस्ता हो तो उसे सम्मान मिल ही जाता है अन्यथा कभी नहीं मिल सकता |

    ravi goswami के द्वारा
    April 18, 2011

    हाँ मित्र मुझे पता है की खेल साम्प्रदायिक नहीं है…साम्प्रदायिक तो इन्सान भी नहीं है…और ना ही पृथ्वी का कोई भी जीव है…सांप्रदायिक तो सोच है. जो उस दिमाग की उपज है जो अज्ञानी है, और पुरे विश्व में कई लोग ऐसे हैं जिनकी सोच ऐसी, मेरा यह प्रयास उस सोच पर ही एक कटाक्ष है, आजादी के बाद हमने अंग्रेजों के चलाये हर चलन को हर को बिना सोचे समझे अपना लिया, अपने दिमाग और सोचने की शक्ति प्रयोग बहुत कम किया, ज़रा सोचिये, आज मुंबई शहर का हर व्यक्ति लगभग ३ घंटे रोज़ सफ़र करने में बर्बाद करता है, शहर की बनावट आवागमन की दृष्टी से व्यापार के लिए कितनी उपयुक्त है.मगर आजादी से पूर्व समुद्र के रास्ते जो सामान लाया जाता था उसकी द्रष्टि से उपयुक्त था पर आज हमने उसे हर काम के लिए ही उपयुक्त मान लिया जिनके लिए वो नहीं है और न हो सकता तो क्या हमारे देश का वत्तीय राजधानी कोई ऐसा शहर नहीं होना चाहिए जो काम करने वाले व्यक्तियों की द्रष्टि से उपयुक्त हो. क्योकि हम इंसान हैं घुलाम नहीं, और अगर घुलामों की ज़िन्दगी देखनी है तो एकबार मुंबई अवश्य जाइए और वहाँ का जनजीवन देखिये,.. और ज़रा सोचिये, के हमारी ऐसी इतनी और कितनी ही समस्याएं है…..और हां एक सवाल संसद में अंग्रेजी बोलने का उद्देश्य क्या है??

    D.K.Shrivastava के द्वारा
    April 19, 2011

    हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी रास्ट्रभाषा हिंदी अभी भी देशव्यापी नहीं है | हमारे कई देश्वाशी अभी भी हिंदी न बोल पाते है, न समझ पाते है | अंग्रेजी उसी का नतीजा है | अंग्रेजी अंतररास्ट्रीय भाषा भी है | हम जब किसी गाँव में होते है तो हमारी सोच सहर तक, राज्य तक तथा अधिक से अधिक देश तक होती है | किन्तु जब संसद में बैठते है तो हमारी सोच अन्तेरास्त्रीय भी होती है | अतः वहा हिंदी में दिक्कते आ सकती है | ऐसे भी भाष वही अच्छी है जो समझ आ सके एक -दुसरे को |

    sandeepkaushik के द्वारा
    April 21, 2011

    ये बात तो आपकी बिल्कुल सही है श्रीवास्तव जी कि भाषा वही हो जो आसानी से समझ मे आ जाये लेकिन हम सबको अपनी ‘राष्ट्र-भाषा’ को भी तो तवज्जो देनी चाहिए न | देश हित  सर्वोपरि होना चाहिए |पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने एक बार संयुक्त-राष्ट्र संघ मे भी अपना भाषण हिन्दी मे दिया था !! इसलिए हमे हिन्दी को भी वैश्विक भाषा बनाने की तरफ समोचित ध्यान देना चाहिए | आशा है आप मेरी भावनाओं की कदर करेंगे || धन्यवाद ||

    DKS के द्वारा
    April 23, 2011

    हमे हिन्दी को भी वैश्विक भाषा बनाने की तरफ समोचित ध्यान देना चाहिए , मै बिलकुल सहमत हूँ आपसे | …………………किन्तु अंग्रेजी का निरादर सिर्फ इसलिए न करे कि यह विदेशी भाषा है | विदेशी भाषा कि भी उपयोगिता हो सकती है |


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